टीबी ख़तरनाक है : लाइलाज नहीं Reviewed by Momizat on . अप्रकट संक्रमण वह है, जब आपको टीबी के कोई लक्षण नहीं दिखते. बैक्टीरिया आपके शरीर में होता तो है, पर वह सक्रिय नहीं होता. सक्रिय टीबी तब होती है, जब लोगों को इसक अप्रकट संक्रमण वह है, जब आपको टीबी के कोई लक्षण नहीं दिखते. बैक्टीरिया आपके शरीर में होता तो है, पर वह सक्रिय नहीं होता. सक्रिय टीबी तब होती है, जब लोगों को इसक Rating: 0
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टीबी ख़तरनाक है : लाइलाज नहीं

टीबी ख़तरनाक है : लाइलाज नहीं

अप्रकट संक्रमण वह है, जब आपको टीबी के कोई लक्षण नहीं दिखते. बैक्टीरिया आपके शरीर में होता तो है, पर वह सक्रिय नहीं होता. सक्रिय टीबी तब होती है, जब लोगों को इसके लक्षण दिखने लगते हैं…तो कैसे बचें इसकी मार से? क्षय, तपेदिक अथवा टीबी एक घातक और संक्रामक बीमारी है. सच तो यह है कि तमाम प्रयासों और चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के बावजूद यह आज भी देश के लिए एक गंभीर समस्या और चुनौती बनी हुई है.

आंकड़े बताते हैं कि हर दिन लगभग 20,000 लोग संक्रमित, 5000 लोग ग्रसित और 1000 लोग असमय काल का ग्रास बन जाते हैं. ऐसे में सभी लोगों को आज इसके प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है. उल्लेखनीय है कि टीबी वायु द्वारा एक से दूसरे व्यक्ति में फैलती है और किसी को भी हो सकती है. इसके जीवाणु का नाम माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस है, जिसकी खोज वैज्ञानिक रॉबर्ट कोच ने 24 मार्च, 1882 को थी. शुरू में इसे लेकर समाज में अनेक भ्रांतियां थीं, क्योंकि इसे लाइलाज एवं जानलेवा बीमारी ही नहीं, बल्कि अभिशाप तक समझा जाता था, लेकिन आज इसका पक्का इलाज उपलब्ध है.

बचाव के लिए बीसीजी का टीका है. इस पर नियंत्रण पाने के लिए देश भर में डॉट्स नामक एक विशेष कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है. इस दिशा में सरकार पूरी तरह गंभीरता बरत रही है. वह निजी मेडिकल स्टोरों पर भी टीबी की दवा मुफ्त उपलब्ध कराने जा रही है. चिंता और भय की कहीं कोई ज़रूरत ही नहीं दिखती, लेकिन फिर भी है बहुत बड़ी चुनौती.

विडंबना यह है कि हमारा समाज क्षय रोगियों को बड़ी हीन दृष्टि से देखता है. कोई भी क्षय रोगी यह नहीं चाहता कि किसी को उसकी बीमारी का पता चले, इसलिए पहले वह अपनी बीमारी छिपाने का हरसंभव प्रयास करता है और इसी वजह से समय पर इलाज नहीं कराता. और अगर कराता भी है, तो विलंब से. नतीजतन सामने मौत खड़ी होती है. ग़ौरतलब है कि देश में टीबी से प्रति तीन मिनट पर दो मौतें होने का यही सबसे बड़ा कारण है. इसलिए अधिकतर चिकित्सक भी रोगी को देखते हुए कहते हैं, कुछ नहीं है, साधारण खांसी-बुखार है, सीने में संक्रमण है, पसलियों पर बलगम जमा है या धब्बे हैं, दवा खाओ, ठीक हो जाओगे. और, दवा वे टीबी की देते हैं.

रोगी को आराम भी पूरा मिलता है, पर वह अपनी बीमारी को गंभीरता से नहीं लेता, थोड़ा ठीक होते ही स्वयं दवा बंद कर देता है. टीबी का इलाज लंबा है और महंगा भी. इसलिए रोगी कभी ऊबकर, तो कभी आर्थिक तंगी के चलते इलाज छोड़ने के लिए मजबूर हो जाता है. कभी-कभी दवा के दुष्प्रभाव भी उसे इलाज छोड़ने के लिए बाध्य कर देते हैं. एक सबसे बड़ा सच यह भी है कि देश में विशेषज्ञ चिकित्सकों की बहुत कमी है. बड़ी संख्या में लोग नीम- हकीमों और झोलाछाप डॉक्टरों के सहारे हैं और वह क्षय रोगियों का सही इलाज नहीं कर पाते.

इस तरह बड़ी संख्या में क्षय रोगी जाने-अनजाने नियमित, पूरा और सही इलाज नहीं करा पाते हैं. उनमें टीबी एमडीआर (Multi Drug Resistant) या कहें कि क्षय जीवाणु मुख्य प्राथमिक क्षय औषधियों, रिफॉम्पिसिन एवं आइसोनियाजिड से लड़ने में सक्षम हो जाते हैं और फिर वह अन्य लोगों को भी अपना शिकार

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