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भारतीय मरीजों के लिये विकसित हुये विशेष कृत्रिम घुटने

भारतीय मरीजों के लिये विकसित हुये विशेष कृत्रिम घुटने

नयी दिल्ली. घुटनों की समस्या से जूझतें भारतीय लोगों को अब अमरीका और यूरोप के मरीजों को ध्यान में रखकर बनाये गये कृत्रिम घुटनों से काम नहीं चलाना पड़ेगा. अब भारतीय मरीजों के लिये उनके घुटनों की बनावट को ध्यान में रखकर विशेष कृत्रिम घुटनों का विकास किया गया है.

भारतीय जीवन शैली तथा भारतीय एवं एशियाई लोगों के घुटने की बनावट को ध्यान में रखकर विकसित किये गये ये कृत्रिम घुटने “एशियन नी” के नाम से भारत में उपलब्ध हो गये है. मुम्बई के आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निलेन शाह बताते है कि भारत के मरीजों खास तौर पर आर्थराइटिस से ग्रस्त महिलाओं के जोड़ पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में छोटे होते है.

इसके अलावा भारत में उठने-बैठने की जो जीवनशैली है उसमें घुटने को अधिक से अधिक मोड़ने की जरुरत पड़ती है. नये कृत्रिक घुटने भारतीय मरीजों की इन्हीं खास जरुरतों को पूरा करते है. ज्वांइट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ. सुभाष जांगिड़ बताते है कि हमारे देश में भारतीय लोग भोजन करने से लेकर पूजा-पाठ करने के लिये घुटने को पूरी तरह मोड़कर पालथी मारकर बैठते है. बैठने की इस तरह की शैली के कारण आर्थराइटिस जैसी घुटने की समस्यायें अधिक होती है.

यही नहीं बैठने की इस शैली के कारण घुटनों की संरचना भी बदल गयी है. ऐसे में भारतीय मरीजों के लिये खास तौर पर बनाये गये घुटनों से आर्थेपेडिक सर्जनों को काफी मदद मिलेगी और भारतीय मरीजों के लिये काफी मददगार साबित होगी. डॉ. जांगिड बताते है कि भारतीय और एशियाई लोगों को खास तरह के घुटनों की जरुरत इसलिए होती है, क्योंकि इनके घुटने अमेरिकी एवं यूरोपीय लोगों के घुटने से अलग होते है और इस कारण अमेरिकी और यूरोपीयाई मरीजों के लिए बनाये गये परम्परागत घुटनों को जब भारतीय एवं एशियाई मरीजों में प्रत्यारोपित किया जाता है तो ये घुटने सही तरह से फिट नहीं बैठते है, जिसके कारण आपरेशन के बाद घुटने में दर्द सूजन एवं अन्य समस्यायें बनी रहती है.

इसके अलावा नये कृत्रिम घुटने को प्रत्यारोपित करने के लिये घुटने की हड्डी को काटने या छीलने की जरुरत नहीं होती है इस तरह से घुटने का बचाव होता है. साथ ही साथ यह पूर्ण लचीलापन प्रदान करता है जिससे घुटने को पूरी तरह से मोड़ने में कोई दिक्कत नहीं होती है. फोर्टिस हास्पीटल के डॉ. ब्रजेश कौशल के अनुसार मौजूदा समय में मोटापे एवं गलत जीवनशैली के कारण जिस तेजी से घुटने की आर्थराइटिस का प्रकोप बढ़ रहा है उसके कारण घुटने बदलने के आपरेशन में भी तेजी आ रही है.

मोटापे के प्रकोप के कारण न केवल अधिक उम्र के लोगों में बल्कि युवकों में भी घुटने एवं जोड़ो की आर्थराइटिस की समस्या बढ़ रही है और इस कारण से 65 साल से कम उम्र के लोगों में भी घुटने एवं अन्य जोड़ों को बदलवाने के आपरेशन की संख्या बढ़ रही है. डॉ. जांगिड बताते है कि आज पहले की तुलना में अधिक संख्या में युवा लोग घुटने एवं अन्य जोड़ बदलवाने के ऑपरेशन करा रहे है. मौजूदा समय में शल्य चिकित्सा तकनीकों में सुधार और बेहतर इम्प्लांटो के विकास होने के कारण आज घुटना बदलने के आपरेशन अत्यंत सामान कारगर एवं सुरक्षित हो गए हैं

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